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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रिय़ः |  ३   क
नित्यव्रती सत्यपरः स वै व्राह्मण उच्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति