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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
सत्यं दानं दमोऽद्रोह आनृशंस्यं क्षमा घृणा |  ४   क
तपश्च दृश्यते यत्र स व्राह्मण इति स्मृतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति