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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंमतः |  ५   क
दानादानरतिर्यश्च स वै क्षत्रिय़ उच्यते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति