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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यो विशत्यनिशं शुचिः |  ६   क
वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति सञ्ज्ञितः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति