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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः |  ७   क
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति