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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे चैतन्न विद्यते |  ८   क
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो व्राह्मणो न च व्राह्मणः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति