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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
ते तमूचुर्महात्मानं न वय़ं सत्क्रिय़ां मुने |  १०   क
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण व्राह्मणो हिंसितो हि नः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति