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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः |  १७   क
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभय़ं न नः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति