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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथय़ामहे |  १८   क
नैषां दुश्चरितं व्रूमस्तस्मान्मृत्युभय़ं न नः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति