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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः स भगवान्मार्कण्डेय़ो महातपाः |  २   क
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति