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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम् |  २१   क
स्वदेशमगमन्हृष्टा राजानो भरतर्षभ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति