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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
हैहय़ानां कुलकरो राजा परपुरञ्जय़ः |  ३   क
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगय़ामचरद्वली ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति