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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यथितः कर्म तत्कृत्वा शोकोपहतचेतनः |  ५   क
जगाम हैहय़ानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति