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आदि पर्व
अध्याय १८३
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घवाहुं; ददर्श कृष्णः सहरौहिणेय़ः |  ३   क
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्च; उपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति