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आदि पर्व
अध्याय १८३
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वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः; पप्रच्छ कृष्णं कुशलं निवेद्य |  ६   क
कथं वय़ं वासुदेव त्वय़ेह; गूढा वसन्तो विदिताः स्म सर्वे ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति