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शान्ति पर्व
अध्याय १८३
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भृगुरु उवाच
सुसुखः पवनः स्वर्गे गन्धश्च सुरभिस्तथा |  १३   क
क्षुत्पिपासाश्रमो नास्ति न जरा न च पापकम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति