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शान्ति पर्व
अध्याय १८३
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भृगुरु उवाच
स्वर्गः प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च |  ३   क
सत्यानृतात्तदुभय़ं प्राप्यते जगतीचरैः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति