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शान्ति पर्व
अध्याय १८३
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भृगुरु उवाच
तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रय़तेत विचक्षणः |  ७   क
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति