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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः |  १०   क
गत्वा च यज्ञाय़तनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति