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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
राजन्वैन्य त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः |  ११   क
स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति