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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तमव्रवीदृषिस्तत्र वचः क्रुद्धो महातपाः |  १२   क
मैवमत्रे पुनर्व्रूय़ा न ते प्रज्ञा समाहिता |  १२   ख
अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति