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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत |  १३   क
अय़मेव विधाता च यथैवेन्द्रः प्रजापतिः |  १३   ख
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति