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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ |  १६   क
ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति