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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
भूय़ोऽथ नानुरुध्यत्स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् |  २   क
सञ्चिन्त्य स महातेजा वनमेवान्वरोचय़त् |  २   ख
धर्मपत्नीं समाहूय़ पुत्रांश्चेदमुवाच ह ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति