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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः |  २१   क
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति