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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं वहुलं निरुपद्रवम् |  ३   क
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति