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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तदत्रिर्न्याय़तः सर्वं प्रतिगृह्य महामनाः |  ३१   क
प्रत्याजगाम तेजस्वी गृहानेव महातपाः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति