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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं भार्या प्रत्युवाचेदं धर्ममेवानुरुध्यती |  ४   क
वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थय़स्व धनं वहु |  ४   ख
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थिने धनम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति