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वन पर्व
अध्याय १८३
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अत्रिरु उवाच
किं त्वस्ति तत्र द्वेष्टारो निवसन्ति हि मे द्विजाः |  ७   क
यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति