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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च वाह्येभ्यश्च विशां पते |  ५८   क
रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति