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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः; पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम् |  १२   क
शुश्राव कृष्णां च तथा निषण्णां; ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति