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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालराजस्तु विषण्णरूप; स्तान्पाण्डवानप्रतिविन्दमानः |  १४   क
धृष्टद्युम्नं पर्यपृच्छन्महात्मा; क्व सा गता केन नीता च कृष्णा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति