आदि पर्व  अध्याय १८४

वैशम्पाय़न उवाच

कच्चित्सवर्णप्रवरो मनुष्य; उद्रिक्तवर्णोऽप्युत वेह कच्चित् |  १६   क
कच्चिन्न वामो मम मूर्ध्नि पादः; कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति