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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
भवति चात्र श्लोकः अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते |  १२   क
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय़ गच्छति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति