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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
अवज्ञानमहङ्कारो दम्भश्चैव विगर्हितः |  १५   क
अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति