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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे |  १७   क
स सुखान्यनुभूय़ेह शिष्टानां गतिमाप्नुय़ात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति