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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याय़े शान्तिरुत्तमा |  २   क
दानेन भोग इत्याहुस्तपसा सर्वमाप्नुय़ात् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति