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वन पर्व
अध्याय १८४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरञ्जय़ |  १   क
पृष्टय़ा मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति