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वन पर्व
अध्याय १८४
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तार्क्ष्य उवाच
किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण; माचक्ष्व मे पृच्छतश्चारुरूपे |  १२   क
त्वय़ानुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां; यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति