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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महावलः |  २०   क
आसीद्घोरं वपुस्तस्य वालुकान्तर्हितं महत् |  २०   ख
दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति