वन पर्व  अध्याय १८४

तार्क्ष्य उवाच

क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे; कर्मोदय़े वुद्धिमतिप्रविष्टाम् |  १६   क
प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य; पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति