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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
अग्निहोत्रादहमभ्यागतास्मि; विप्रर्षभाणां संशय़च्छेदनाय़ |  १७   क
त्वत्संय़ोगादहमेतदव्रुवं; भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति