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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
श्रेष्ठानि यानि द्विपदां वरिष्ठ; यज्ञेषु विद्वन्नुपपादय़न्ति |  १९   क
तैरेवाहं सम्प्रवृद्धा भवामि; आप्याय़िता रूपवती च विप्र ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति