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वन पर्व
अध्याय १८४
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं पृष्टा प्रीतिय़ुक्तेन तेन; शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमवुद्धिय़ुक्तम् |  ४   क
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मय़ुक्तं हितं च; सरस्वती वाक्यमिदं वभाषे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति