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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
यो व्रह्म जानाति यथाप्रदेशं; स्वाध्याय़नित्यः शुचिरप्रमत्तः |  ५   क
स वै पुरो देवपुरस्य गन्ता; सहामरैः प्राप्नुय़ात्प्रीतिय़ोगम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति