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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः; सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः |  ६   क
अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था; हिरण्मय़ैरावृताः पुण्डरीकैः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति