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आदि पर्व
अध्याय ५४
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सूत उवाच
ततस्तं सत्कृतं सर्वैः सदस्यैर्जनमेजय़ः |  १७   क
इदं पश्चाद्द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति