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उद्योग पर्व
अध्याय १८४
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भीष्म उवाच
नक्तञ्चराणां भूतानां रजन्याश्च विशां पते |  २   क
शय़नं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तय़म् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति