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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
निःसंशय़ं क्षत्रिय़पुङ्गवास्ते; यथा हि युद्धं कथय़न्ति राजन् |  १२   क
आशा हि नो व्यक्तमिय़ं समृद्धा; मुक्तान्हि पार्थाञ्शृणुमोऽग्निदाहात् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति