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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सिंहान्व्याघ्रान्वराहांश्च नागांश्च मनुजाधिप |  १०६   क
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते |  १०६   ख
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्पर्यचरं तदा ||  १०६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति