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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः; पुरोहितं प्रेषय़ां तत्र चक्रे |  १४   क
विद्याम युष्मानिति भाषमाणो; महात्मनः पाण्डुसुताः स्थ कच्चित् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति